ससुराल में बीवी और उसकी भानजी संग- 3

भानजी की चुदाई कहानी में पढ़ें कि मैंने अपनी पत्नी से उसकी भांजी की चूत दिलवाने को कहा. पहले तो वो मना करने लगी पर बाद में वो मान गयी मेरी मदद के लिए.

सभी पाठकों को नमस्कार। एक बार फिर से अपनी रियल हिंदी सेक्स स्टोरी में आपका स्वागत करता हूं.
मेरी बीवी की चुदाई की कहानी की दूसरी किश्त

पत्नी की भानजी की चुदाई की लालसा

में आपने पढ़ा कि पड़ोस के घर में मैंने उसकी चुदाई की जिसमें मेरी बीवी की भांजी यानि कि मेरी साली दिव्या ने हमारी मदद की।

चुदाई के बाद उसकी रहस्यमयी मुस्कान देखकर मुझे पूरा संदेह था कि उसने मेरे लिंग को अवश्य ही मेरी बीवी की योनि को चोदते हुए देख लिया है.
इन्हीं विचारों से प्रेरित होकर मैं उसकी भी चुदाई के सपने देखने लगा.

अगले रोज मेरे ताऊ ससुर की तेहरवीं के बाद दिव्या की मां ने हमें वहीं रुकने का आग्रह किया और मेरा सपना जैसे पूरा होता दिखा.

रात को दिव्या मेरे साथ शर्त लगाकर लूडो खेल रही थी और मैंने बीती रात की चुदाई वाली बात छेड़ दी।

अब आगे भानजी की चुदाई कहानी:

मैंने पूरा ध्यान लूडो पर लगा दिया मगर बदकिस्मती से हार गया। मैंने महसूस किया कि इस खेल के दौरान मेरे बरमूडा के अंदर मेरा लिंग पूरी तरह तनतना चुका था।

लूडो में हारने के बाद मैं जानबूझकर गद्दे पर सीधा लेट गया ताकि ना चाहते हुए भी दिव्या की नजर मेरे लिंग की तरफ जरूर जाए।

हुआ भी ऐसा ही!

मेरे लेटते ही दिव्या की नजर मेरे बरमूडा पर गई और उसने नजरें नीची कर लीं.
मैंने तुरंत दिव्या से कहा- हम हार गए स्वीटहार्ट, मांगो क्या मांगती हो?

  भाभीजान के साथ मेरी पहली लम्बी चुदाई

दिव्या बोली- मौसा जी, बस आप ऐसे ही सदा खुश रहिए, मुझे और कुछ नहीं चाहिए।
मुझे लगा जैसे रेत का किला ढहने वाला है।

मैंने तुरंत अगला पासा फेंका और बोला- या तो तुम मांगो जो मांगना है वर्ना तो फिर मैं मांगूगा और फिर तुम्हें देना भी पड़ेगा।
दिव्या बोली- बस मुझे तो कुछ नहीं चाहिए, आप मांग लो जो आपको चाहिए, मैं दे दूंगी।

अब मेरे लिए परीक्षा की घड़ी थी। मुझे नहीं पता था कि ऊंट किस करवट बैठेगा।
मैंने फिर भी आग में हाथ डालने का निर्णय किया और हंसते हुए दिव्या से कहा- चल तो … फिर अपने स्वीटहार्ट, को एक किस्सी दे दे।

दिव्या बोली- क्यों? बीती रात को मौसी ने इतनी सारी किस्सी दी थी। आपका पेट नहीं भरा?
मैंने भी बेशर्म बनकर बरमूडा के ऊपर से ही अपने तने हुए लिंग पर हाथ फेरते हुए कहा- भला इश्क से कभी किसी का पेट भरा है?

मैंने महसूस किया कि दिव्या की नज़र लगातार वहां जा रही थी। मैं भी तो यही चाहता था. मैं जल्दी बिल्कुल नहीं करना चाहता था।

अभी मेरे पास काफी समय था। मैंने तुरंत दिव्या से फिर से किस्सी देने के लिए कहा।

दिव्या बोली- मौसा जी, अच्छा नहीं लगता। अब मुझे चलना चाहिए।
ये बोलकर वो वहां से उठ खड़ी हुई।

मैं भी दिव्या के पीछे पीछे उठ खड़ा हुआ। दिव्या ने तुरंत मेरी तरफ अपनी पीठ कर ली। मैंने पीछे से दिव्या की एक बाजू पकड़ते हुए उसे रोका।

मैंने महसूस किया कि दिव्या का बदन गर्म हो रहा था। यह मेरे लिए सकारात्मक संदेश था।

मेरा दिमाग बहुत तेजी से काम कर रहा था।
मौके को अपने हाथ में पकड़ते हुए मैंने पीछे से ही दिव्या के और करीब जाते हुए उसकी गर्दन के पास अपना मुंह ले जाकर बहुत हल्की सी फुसफुसती हुई आवाज ने कहा- स्वीटहार्ट, तू मेरी साली है यार … एक किस का हक तो बनता है।

दिव्या ने कोई जवाब नहीं दिया और चुपचाप खड़ी हो गयी। मैंने दिव्या की चुप्पी को हाँ मानते हुए थोड़ा और आगे बढ़ते हुए पीछे से ही दिव्या को अपनी बलिष्ठ बांहों में भर लिया।

वो तो जैसे इसी इंतजार में थी। उसने एक बार भी मुझसे छूटने की बजाए पीछे को होकर अपने पूरे बदन को मेरे बदन से चिपका लिया।
मैंने महसूस किया कि बरमूडा के ऊपर से मेरा लिंग दिव्या के नितंबों के बीच की दरार में जा लगा है जिसका अहसास दिव्या को भी जरूर हो रहा होगा।

मैंने एक हाथ से दिव्या के खूबसूरत घुंघराले बालों को उसके कान के पास से हटाया और बहुत हल्के से होंठों से उसके कान के नीचे एक प्यारी सी चुम्मी दी।

दिव्या ने बिना मेरे हाथ से छूटने की कोशिश किए ही वहीं खड़े खड़े एक बहुत मीठी सी सिसकारी ली और अपनी गर्दन झुका ली।
मगर जैसे ही मैंने अपने होंठ दिव्या की गर्दन से अलग किए वह मेरी बाजू से छूटते हुए बोली- अच्छा अब मैं चलती हूं।

मुझे तो लगा जैसे आज चिड़िया हाथ से निकल गई।
मैंने तुरंत दिव्या को जोर से पकड़ लिया और अपनी तरफ खींचा.
दिव्या एक झटके से मेरी तरफ घूम कर मेरे बदन से टकराती हुई बोली- प्लीज मौसा जी … मुझे जाने दो।

मगर मैंने महसूस किया यह बोलने के बाद भी दिव्या वहीं खड़ी रही।
मैंने मौके का फायदा उठाते हुए दिव्या के होंठों पर अपने होंठ रख दिये और दिव्या को बांहों में भर लिया।

दिव्या मेरी बांहों से छूटने की कोशिश तो कर रही थी लेकिन उसने एक बार भी मेरे होंठों से अपने होंठ अलग करने की कोशिश नहीं की। मेरे लिए यह एक सकारात्मक संदेश था.

मैंने दिव्या के होंठों को चूमने के बाद उसकी ठोड़ी और गले के निचले भाग को अपनी जीभ से सहलाना शुरू कर दिया.
मेरा यही कृत्य बस दिव्या को पिघलाने लगा.

हालांकि उसके मुंह पर लगातार ‘ना’ ही थी लेकिन उसका बदन मुझसे दूर होने की कोशिश नहीं कर रहा था। शशि के आने में अभी आधा घंटा बाकी था. मैंने दिव्या की गर्दन और गले के पूरे क्षेत्र को अपनी जीभ से सहलाना शुरू कर दिया।

दिव्या की सिसकारियां लगातार बढ़ती जा रही थीं- छोड़ दो, मौस्स्सा जी ईई … बड़ी प्रॉब्लम हो रही है, प्लीज छोड़ दो।
ये बोलते हुए भी दिव्या नीचे अपने हाथ को लगातार मेरे लिंग पर टकरा रही थी।

मैं समझ चुका था कि अब दिव्या को इसकी जरूरत है. बस उसकी झिझक को तोड़ना बाकी था।
मैंने दिव्या की पीठ को अपनी तरफ घुमाया और उसके बाल हटाकर फिर से उसकी गर्दन के निचले हिस्से को चाटना चालू कर दिया।

साथ ही मैंने दिव्या की टी-शर्ट के अंदर हाथ डाल कर जैसे ही मैंने हाथ ऊपर की तरफ चलाए तो मैंने महसूस किया कि दिव्या ने तो अंदर कोई ब्रा पहनी ही नहीं थी।

मैं हैरान था यह देखकर कि बिना ब्रा के भी दिव्या की चूचियां ऐसे तनी हुई थीं कि पता ही नहीं लग रहा था।
टी-शर्ट के अंदर ही मैंने दिव्या के दोनों निप्पल के ऊपर अपनी उंगलियां फिरानी शुरू कर दीं।

अब मेरे दोनों हाथ दिव्या के निप्पल पर थे और मेरी जीभ दिव्या की गर्दन को सहला रही थी.
अचानक दिव्या ने पीछे हाथ करके मेरे लिंग को जोर से पकड़ लिया और फिर बोली- मौसा जी, प्लीज छोड़ दो … मौसी आने वाली है।

मैंने हंसते हुए कहा- मैं जब तक नहीं बुलाऊंगा तेरी मौसी नहीं आएगी।
यह जवाब सुनकर दिव्या की पकड़ और कड़ी हो गई और वह मनुहार करते हुए बोली- प्लीज … प्लीज … मौसा जी … प्लीज मौसा जी।

बिना अब कोई देर किए मैंने दिव्या की टीशर्ट को निकाल दिया. दिव्या की छाती पर लगी दो खूबसूरत पहाड़ियां मुझे आश्चर्यचकित कर रही थीं. मैंने बिल्कुल एक ही शेप की ऐसी खूबसूरत चूचियाँ और उनके ऊपर अति सुंदर भूरे गुलाबी रंग के गोले आज से पहले कभी नहीं देखे थे.

अब दिव्या मेरे हाथों से छूटने का प्रयास बिल्कुल नहीं कर रही थी.

मैंने दिव्या को वहीं नीचे बिछे गद्दे पर लिटा लिया और अपने हाथ उसके बदन पर फिराते हुए एक-एक करके उसके दोनों निप्पल को चूसने लगा।

“उफ … उफ … उफ … आह ओ… मा … प्लीज … हाए … जीजा जी … आह्ह … नहीं मौसा जी … आह्ह … ओह्ह जैसी उसके मुंह से निकलने वाली कामुक आवाजें केवल यही बता रही थीं कि उसका विरोध बनावटी था और असल में उसको लिंग का सुख चाहिए था।

दिव्या मेरे द्वारा उसके निप्पल चुसवाने का पूरा आनंद ले रही थी. ऐसा लग रहा था जैसे दिव्या किसी नशे में है.
मैंने बिना कोई समय गँवाए निप्पल को चूसना जारी रखा और एक हाथ उसके बदन पर फिराते हुए दूसरे हाथ से उसके पाजामे को धीरे से नीचे सरका दिया।

उसने भी अपने नितंब हल्के से हिला कर इसमें मेरा सहयोग किया और जैसे ही पजामा नीचे सरका तो दिव्या की गोरी चिकनी चूत मेरे सामने रोशन थी।

दिव्या के बदन की तरह उसकी कामायनी चूत भी बहुत गोरी थी। लगता है बाल भी अभी कुछ दिन पहले ही साफ किए थे; इसीलिए वह चमक रही थी।

मैं तो उसके इस काम द्वार को देखकर अभीभूत सा हो गया।
दिव्या गद्दे पर पूरी तरह से नंगी पड़ी थी।

मैंने नीचे उसकी टांगों के बीच में जाकर उसकी प्यारी सी … खूबसूरत … क्यूट सी दिखने वाली चूत को चाटने का निर्णय किया।

मगर यह क्या? जैसे ही मैं दिव्या की टांगों के बीच में पहुंचा उसे तो जैसे होश आ गया। उसने अपनी दोनों टांगें जोड़ लीं और तुरंत उठ कर बैठ गई।

अपना पजामा पकड़ते हुए बोली- नहीं मौसा जी … मुझे जाना है … मौसी आ जाएगी। प्लीज मुझे जाने दो।
मुझ पर तो जैसे पहाड़ सा टूट गया।

बड़ी मुश्किल से तो दिव्या को यहां तक लाया था। एक कोशिश और करके देख ली जाए यही सोचकर मैंने फिर से दिव्या को लिटा दिया और उसके होंठों और गर्दन को चूसना शुरू कर दिया.

एक उंगली से मैं उसके दोनों निप्पल को सहलाने लगा और दूसरे हाथ की उंगली से हल्के हल्के उसके योनि द्वार की बीच की गहराई सहलाने लगा।

दिव्या जैसे उड़ना चाह रही थी मगर किसी अदृश्य बंधन में बंधी थी।
मैं चाहता था यह अदृश्य बंधन कुछ देर और बना रहे.

दिव्या का बदन किसी अप्सरा से कम नहीं था. उसकी दोनों चूचियां छाती पर सीधी तनी खड़ी थीं।
मैंने धीरे धीरे फिर से दिव्या का बदन से सहलाना शुरु कर दिया।

सहलाते हुए मैंने महसूस किया कि दिव्या की योनि में हल्का सा गीलापन है।
मैं बस इसी समय के इंतजार में था. मैंने कोई देर नहीं की और अपना हाथ वहां से हटाकर तुरंत अपना बरमूडा नीचे सरका दिया।

जैसे ही मेरा बरमूडा नीचे हुआ और मेरा तमतमाया हुआ लिंग बाहर निकला दिव्या ने अपने हाथ से तुरंत उसे पकड़ लिया- ओ हो मौसा जी … प्लीज मौसा जी!
की आवाज़ के साथ दिव्या मेरे लिंग को सहलाने लगी।

अब मुझे लग रहा था कि काम पूरा हो ही जाएगा. मैं वहां से उठकर दिव्या की योनि की तरफ मुंह करके लेट गया. मैं जानबूझकर इस तरह लेटा कि मेरा लिंग दिव्या की चुचियों से टकराने लगे.

लेटकर मैंने दिव्या की योनि को अपनी जीभ से चाटना शुरू कर दिया और वो एकदम से सिसकारी- आह्ह … प्लीज मौसा जीईई ईईईई … मत करो प्लीज … नहीं … मौसा जी … मत करो … बर्दाश्त नहीं हो रहा है।

ऐसा बोलते हुए दिव्या अपना मुंह ऊपर करके मेरे लिंग को चाटने का प्रयास करने लगी।
मैं समझ गया कि अब दिव्या मेरे हाथ से भागने वाली नहीं है।

मैंने पूरी तरह से दिव्या के ऊपर आकर अपना लिंग इस प्रकार उसके मुंह पर सेट किया कि मेरा मुंह उसकी योनि के ऊपर ही रहे।
वो फिर बड़बड़ायी- मान जाओ ना मौसा जी… प्लीज मान जाओ … बहुत परेशानी हो रही है … सारे बदन में चीटियां दौड़ रही हैं।

बोलते हुए दिव्या ने अपनी जीभ बाहर निकाल कर मेरे लिंग पर रखकर उसको चाटना शुरू कर दिया.
यह मेरे लिए अति सुखद क्षण था क्योंकि शशि कभी भी लिंग को चाटना पसंद नहीं करती थी।

मैंने अपने हाथ से दिव्या की योनि के दोनों होंठों को खोलकर जीभ को योनि के अंदर तक डालना शुरू कर दिया। उसकी योनि अंदर से भी बिल्कुल गुलाबी थी जो मुझे और ज्यादा उत्तेजना दे रही थी।

अब मैं तेजी से अपनी जीभ उसकी योनि के अंदर बाहर करने लगा।

अब दिव्या बिना कुछ बोले एक हाथ से मेरा लिंग पकड़ कर अपने मुंह के अंदर ले जाकर लॉलीपॉप की तरह चूस रही थी।

थोड़ी देर बाद मुझे लगने लगा कि अगर मैंने जल्दी नहीं की तो मैं शायद दिव्या के मुंह में छूट जाऊंगा।

बिना कोई देरी किए मैं दिव्या के ऊपर से जैसे ही हटा दिव्या तुरंत बोली- प्लीज मौसा जी … मर जाऊंगी … बहुत बेचैनी हो रही है। मुझे छोड़ दो।

मैं उसकी किसी बात पर ध्यान नहीं दे रहा था. मैंने दिव्या की दोनों टांगों को फैलाया और उनके बीच में जाकर बैठ गया.

मुझे यह भी नहीं पता था कि दिव्या मेरा लिंग आराम से ले ली पाएगी या नहीं।

इसीलिए मैंने अपने मुंह से थोड़ा सा थूक निकालकर अपने लिंग पर लगा दिया. हालांकि इस काम में 2 सेकंड ही लगे होंगे मगर इसी बीच दिव्या ने अचानक आंखें खोलीं और मेरे तरफ देखा।

हम दोनों की नजरें एक दूसरे से मिलीं और दिव्या मुस्कराई।
मैंने नीचे झुक कर उसकी योनि पर बहुत प्यार से एक किस्सी दी तो दिव्या हंसते हुए बोली- अब रहने दो, कहां-कहां किस करोगे। आप बहुत गंदे हो।

इसी बीच मैंने अपना लिंग दिव्या के योनि द्वार पर लगाया और दिव्या से पूछा- डालूं?
दिव्या ने भी झुँझलाते हुए कहा- नहीं, आप रहने दो, मुझे जाने दो

मैं समझ चुका था कि दिव्या भी खेल का मजा ले रही है। मैंने अपने हाथ से लिंग को पकड़कर दिव्या की योनि के ऊपर लिंग से सहलाना शुरू कर दिया।

मुश्किल से 10 सेकंड ही बीतने पाए थे कि दिव्या फिर बोली- प्लीज मौसा जी … मैं मर जाऊं क्या? अंदर तक चीटियां दौड़ रही हैं … कुछ करो।

मैंने कहा- अरे स्वीटहार्ट, इसी बात का तो इंतजार कर रहा था। तू पहले बोल देती!
यह बोलते ही मैंने उसके बदन को पकड़कर लिंग को अंदर करना शुरू कर दिया।

दिव्या की योनि बहुत कसी हुई थी। दिव्या की भी आह … निकल रही थी।
पूरा लिंग अंदर नहीं जा रहा था.

तभी दिव्या बोली- मौसा जी, धीरे से करो, आपका बहुत मोटा है। मुझे दर्द हो रहा है।

मैंने एक झटके में अपना पूरा लिंग बाहर निकाल लिया।
एक बार फिर अपने हाथ पर थूक लेकर पूरे लिंग पर अच्छे से लगाया और दिव्या की भट्टी जैसी तपती योनि में धीरे-धीरे सरकाना शुरू कर दिया।

वो तड़प कर सिसकारी- ऊईई … मां आह … उफ्फ़ … मौसा जी!
इसी चीत्कार के साथ दिव्या भी अपने नितंबों को उछाल कर पूरा प्रेम दंड अंदर लेना चाह रही थी।

तीन चार बार हल्के हल्के धक्के मारने के बाद मैंने अचानक एक जोर का झटका मारा और पूरा लिंग दिव्या की योनि में उतार दिया।
“हाय … रेएए एएएए … की एक चीख के बाद आह … आह … उफ्फ़ … मौसा जी!” बोलते हुए दिव्या भी मेरा सहयोग करने लगी।

अब मेरे झटके पूरे जोरदार लगने लगे थे. हम दोनों पसीने पसीने हो रहे थे.
दिव्या भी अपने चूतड़ उचका उचका कर पूरा सहयोग कर रही थी.

कुछ सेकंड के बाद आह … आह … की आवाज के साथ दिव्या अचानक शांत हो गई।

अभी मेरे धक्के बाकी थे।
मैंने पूछा- क्या हुआ?”
दिव्या ने आंखें खोलीं और मेरे गाल पर हल्की सी चपत लगाकर बोली- गंदे मौसा जी, जल्दी करो।

मेरे झटकों की रफ्तार तेज हो चली थी. दस बारह धक्के मारने के बाद मेरा फव्वारा भी दिव्या के अंदर ही छूट गया।
एक बार फिर ‘उफ्फ़ … मौसा जी!’ बोल कर दिव्या ने नीचे खींच कर मुझे अपने से चिपका लिया.

हम दोनों शांत होकर उसी गद्दे पर लेट गए।
तभी अचानक खखारने की आवाज आई और बाहर से सुनाई दिया- काम निपट गया हो तो मैं अंदर आऊं?

आवाज सुनकर हम दोनों ने दरवाजे की तरफ देखा तो वहां शशि खड़ी थी.
दिव्या ने झटके में चादर अपने ऊपर ओढ़ ली।
शशि हंसने लगी और बोली- मैं जल्दी तो नहीं आ गई?

दिव्या आश्चर्यचकित होकर मेरी और शशि की तरफ देखने लगी.
तब शशि ने बात को संभालते हुए कहा- कोई बात नहीं साली भी तो आधी घरवाली होती है।

अपने साथ लाए हुए दूध को हमें पकड़ाते हुए वो बोली- बहुत मेहनत की है. चलो दूध पी लो।
दिव्या ने फटाफट से अपने कपड़े पहने और दूध पकड़ लिया।

वो हम दोनों के साथ नजरें झुकाए बैठी थी। कुछ भी नहीं बोल रही थी।

अब माहौल को सामान्य करने की जिम्मेदारी मेरी थी।
मैंने जानबूझकर शशि को छेड़ते हुए कहा- यार दिव्या सच में तुम्हारी तरह ही सेक्सी है।
तो शशि बोली- मेरी तरह नहीं, मुझसे भी ज्यादा!

दिव्या नजरें झुकाए बैठी थी. मैंने अपना बरमूडा उठाया और पहनकर दिव्या से लूडो खेलने को कहा।
दिव्या तो जैसे अपनी जगह से हिल ही नहीं रही थी.

मैंने जानबूझकर दिव्या के मोबाइल में लूडो लगाया और अपनी गोटी चल दी.
फिर शशि से चलने को कहा. शशि ने भी अपनी चाल चल दी।

अब दिव्या की चाल थी.
हम दोनों ने दिव्या को कहा कि अब ध्यान लूडो पर लगाओ और गेम खेलते हैं।

दिव्या समझ चुकी थी कि शशि को इस बारे में सब मालूम है.

कुछ देर अनुरोध करने के बाद दिव्या भी लूडो खेलने लगी।

तो साथियो, करीब 2 साल बाद लिखी गई मेरी कहानी आपको कैसी लगी मुझे जरूर बताएं.
यदि कहानी में कोई कमी हो तो वो भी बताएं ताकि उसको सुधारा जा सके।

आपसे ये भी अनुरोध है कि यदि इस भानजी की चुदाई कहानी में कोई खूबियां हो तो वो भी बताएं ताकि उनको और अधिक निखारा जा सके. आपके स्नेह और प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में।
आप अपना स्नेह और प्रतिक्रिया कृपया कमेंट पर भेजें।
धन्यवाद।